" ग़ालिब ओर उनके एक शेर पर "
इन दिनों मुझे एक शेर ने और उसके निगार ने बेहद बेचेन किया हुवा है, वेसे मुझे बेचेनियत मे कोई बुराई नहीं लगती, भली ही लगती है, विशेषकर कला मध्यम में मुझे बेचेन लोग मुझे काफी करीब लगते है,यह कलाधर्मी बेचेन लोग अन्य बेचेन लोगों को बेहद गहरी प्रेरणाए देते आए है, यह उनकी अभिवक्ति का माध्यम बनते है. इन दिनों काफ्का और दोस्तोवस्की को पड़कर लगने लगा है कि सबसे बड़े बेचेन साहि
इन दिनों मुझे एक शेर ने और उसके निगार ने बेहद बेचेन किया हुवा है, वेसे मुझे बेचेनियत मे कोई बुराई नहीं लगती, भली ही लगती है, विशेषकर कला मध्यम में मुझे बेचेन लोग मुझे काफी करीब लगते है,यह कलाधर्मी बेचेन लोग अन्य बेचेन लोगों को बेहद गहरी प्रेरणाए देते आए है, यह उनकी अभिवक्ति का माध्यम बनते है. इन दिनों काफ्का और दोस्तोवस्की को पड़कर लगने लगा है कि सबसे बड़े बेचेन साहि
त्यकार वाही होंगे जो अपने
समय के सबसे ज्यादा बेचेन लोग रहे होंगे, मुझे लगता है यह लोग अभिव्यक्ति
के लिए विवश है. बेचेनी से भरे कई नाम कई चेहरे याद आते है, किन्तु इन
दिनों उस शायर के चेहरे ने मुझे चकाचोंध कर रखा है, ग़ालिब नाम है उनका.
भारतीय इतिहास में सबसे बेचेन कवि, शायरों के शायर ग़ालिब के काव्य में उनके समय के ग़ुल ओ खार पूरी शिद्दत से मोजूद है. उन्होंने अपनी उम्र में एक पुरे समय की बदलाहट को जज़्ब किया था, ग़ालिब उस सदी के कवि है जिस सदी ने अपनी प्रोड़ उम्र में अपने हाथो अपनी नब्ज़ काट ली थी और पुरे १०७ साल (१८५७ से १९५०) तक अपनी कटी नब्ज़ से रिसते बगावत के लहू को लेकर भटकती रही, ग़ालिब उसी घायल सदी के कवि है.
कुछ दिनों से उनका एक मशहूर शेर मेरी जुबा पर दिन-ओ-रात मचल रहा है, जबसे मेने उसे शुभा मृद्गल की बरगत सी आवाज़ में सुना है...इस ने मुझे बड़ा बेचेन कर रखा है. "हजारो ख्वाहिशे एसी कि हर ख्वाहिशे पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले"
जहा शायरी(उर्दू कविता) की बात आती है ग़ालिब मेरे सबसे प्रिय शायरों में सबसे पहले है, मै उन्हें अपने शुरुवाती दौर से पढ़ रहा हूँ, उन्ही शुरुवाती दौर में जब मै कला के प्रति आकर्षित हुवा था, उस दौर में ग़ालिब ने मेरी संवेदना को बेहद उची परवाज़ दी, विशेषकर रोमानियत के मामलों में. कुछ सालों में मेने उनके वैचारिक पहलु को भी जाना और उनसे अभिभूत हुवा. शायरों में ग़ालिब के बाद गुलज़ार, फिराख गोरखपुरी, से बेहद आत्मीयता पाई, और अब, उम्र के इस दौर में जब लड़कपन के मस्ताने ख्वाबों का पुर्ण विलय एक यूवात्मक इकाई में होता जा रहा है तो मै फेज़ अहमद फेज़, साहिर लुधियानवी और केफ आज़मी को ज्यादा करीब पाता हूँ. किन्तु ग़ालिब का अंदाज़-ए-बया कुछ और ही है,वोह मुझ पर ग्रीष्म के तारो सा फेले है.
"हजारो ख्वाहिशे एसी..."एक व्यक्ति के भीतर व्याप्त चाह, अभिलाषा या कामना की वृत्ति का आंकलन है...उसे समझने की साजिश है...मुझे लागता है सारी रचनाए, सरे सुखन, सारी अभिव्यक्तिय चीजो को समझने की कोशिश न होकर उनसे उनके परदे छीन लेने की साजिश है ग़ालिब ने इस शेर में अभिलाषाओ पर पड़े पर्दों को नोच बिखेरा है, उसे नंगेज़ किया है, उसे खालिस कर दिया है.
"हजारो ख्वाहिशे एसी..." मुलभुत रूप से कामनाओ की पड़ताल है. इस शेर के मायने भी गर्त में जमे हुवे है, गोया हर्फे सतह पर तिरते रहते है.
आखिर इसी क्या बात है कि इतने 'अरमान' निकल रहे है, फिर भी कम है, गोया एक-एक पे दम निकलता है.
छोटी-छोटी ख्वाहिशो के लिए भी एक ओसत आदमी को पूरी ताकत लगाकर दोड़ना होता है, बड़ी ख्वाहिशे बड़े सपनो में बदल जाती है, जो शायद ही पूरी होती हों, जबकि समय उसे ओर धुंधला करता जाता है और मात्र एक अदृश्य पश्चाताप की झीनी परत रह जाती है. क्योंकी फिर आदमी के पास समय कहा बचता है,समय तो आदमी को निरंतर काटता जा रहा है क्योकि.
मेने कई बार देखा है कि लोग मौत के लिए भी मिन्नतें करते है,क्योंकी वे लोग अपने जिवन के अंतिम समय में अभिलाषाओं से, जिवन के लिए संगृहीत सपनों से उक्ता जाते है. आखिर कब तक और क्या क्या अभिलाषाएं करे जबकि जिवन तो मुकाम पर पहुचने वाला है,लेकिन यह जल्दी क्यों नहीं पहुच रहा है? इसलिए जीवनांत के लिए एक और ख्वाहिश. और इसके लिए भी कितना दम लगते है लोग,प्रतीक्षा करते है, रोते है, पूजा करते है, दान करते है, भीख मांगते है उससे जिसने जिवन भीख में दिया.
एसी क्या बात है की आदमी सतत डिमांड करता है, एसी क्या चीज़ है आदमी के भीतर जिसके कारण आदमी खुद में एक डिमांडिंग काम्प्लेक्स निर्मित करता है, जो की आपने आवरणों मे बेहद सहज दिखता है, एक सहज वृत्ति सा.
"हजारो ख्वाहिशे आदमी करता है और उन्हें पूरा नहीं कर पाता" यह शेर का पहला मिसरा कहता है.दूसरा कहता है" कितने ही अरमान क्यू न निकल जाए, कम ही है." दूसरा मिसरा पहले से बिलकुल अलहदा है, यह मिसरा पहले मिसरे का पूरक नहीं लगता, इस मिसरे ने तो पहले वाले मिसरे को भग्न कर दिया है, उसकी मान्यताओ को तोड़ दिया है, ग़ालिब ने बिलकुल अलग बात कही है, जेसे वोह पहला मिसरा लिखते हो और दूजे में उसकी हंसी उड़ा रहे है, उसे हीन बता हरे है. यह मिसरा कहता है कि भले ही हजारों ख्वाहिशे हो, अनंत अभिलाषाए हो और चाहे उन हजारो में से प्रत्तेक को पूरा करने में दम निकलता हो! कोई बात नहीं, कितना ही क्यू न निकले दम, कम ही है. क्योकि एक एक विराट अभिलाषा हममे कही गहरी पेठी है, हमारी एक बहुत बड़ी ख्वाहिश है (शायद जिसका हमें कोई पाता न हो, कोई खबर न हो, कोई अंदाज़ा न हो) जो हममे कही जज़्ब है, जो हमारी आत्मा कि धरती में कही दफ्न है. वो है खुद को पा लेने कि ख्वाहिश, खुद को जन लेने कि तमन्ना.
भारतीय उर्दू साहित्य में ग़ालिब ही थे जिन्होंने पहली मर्तबा कामना की मोलिकता, उसके मूल स्वभाव की और इशारा किया. वेसे तो कामना की उदद्विग्नता को हर युग में पाप कर्म ही मन गया है, यहाँ तक कि कामना को शेतन का ओजार तक कहा गया है, चाहे ईसाइयत हो, यहूदी या मुस्लिम समुदाय, हर संप्रदाय में इसे पाप या पाप का कराल मन गया है. ग़ालिब मुस्लिम संप्रदाय से थे. एक बार उन्होंने खुदको आधा मुसलमान कहा था, मसलन एक अधुरा धर्मावलम्बी, वोह दुनियाभर के वाईजो से सीना ठोक के कहते है "वाईज़ शराब पिने दे मस्जिद में बेठ के, या वो जगह बता जहा पर खुदा न हो". ग़ालिब का आधा मुस्लमान होने में उनका वजूद है. शायद आधा मुस्लमान होना उतना मायने नहीं रखता जितना आधा खुद (self) का होने में रखता है, आधा मुस्लमान होना, यह उनका एक ओजार है जाहिदों के खिलाफ.यह उनके सुखन की एक खास विचारात्मक शेली है, उनके काव्य के मुलभुत विचारात्मक बिंदु.
भारतीय इतिहास में सबसे बेचेन कवि, शायरों के शायर ग़ालिब के काव्य में उनके समय के ग़ुल ओ खार पूरी शिद्दत से मोजूद है. उन्होंने अपनी उम्र में एक पुरे समय की बदलाहट को जज़्ब किया था, ग़ालिब उस सदी के कवि है जिस सदी ने अपनी प्रोड़ उम्र में अपने हाथो अपनी नब्ज़ काट ली थी और पुरे १०७ साल (१८५७ से १९५०) तक अपनी कटी नब्ज़ से रिसते बगावत के लहू को लेकर भटकती रही, ग़ालिब उसी घायल सदी के कवि है.
कुछ दिनों से उनका एक मशहूर शेर मेरी जुबा पर दिन-ओ-रात मचल रहा है, जबसे मेने उसे शुभा मृद्गल की बरगत सी आवाज़ में सुना है...इस ने मुझे बड़ा बेचेन कर रखा है. "हजारो ख्वाहिशे एसी कि हर ख्वाहिशे पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले"
जहा शायरी(उर्दू कविता) की बात आती है ग़ालिब मेरे सबसे प्रिय शायरों में सबसे पहले है, मै उन्हें अपने शुरुवाती दौर से पढ़ रहा हूँ, उन्ही शुरुवाती दौर में जब मै कला के प्रति आकर्षित हुवा था, उस दौर में ग़ालिब ने मेरी संवेदना को बेहद उची परवाज़ दी, विशेषकर रोमानियत के मामलों में. कुछ सालों में मेने उनके वैचारिक पहलु को भी जाना और उनसे अभिभूत हुवा. शायरों में ग़ालिब के बाद गुलज़ार, फिराख गोरखपुरी, से बेहद आत्मीयता पाई, और अब, उम्र के इस दौर में जब लड़कपन के मस्ताने ख्वाबों का पुर्ण विलय एक यूवात्मक इकाई में होता जा रहा है तो मै फेज़ अहमद फेज़, साहिर लुधियानवी और केफ आज़मी को ज्यादा करीब पाता हूँ. किन्तु ग़ालिब का अंदाज़-ए-बया कुछ और ही है,वोह मुझ पर ग्रीष्म के तारो सा फेले है.
"हजारो ख्वाहिशे एसी..."एक व्यक्ति के भीतर व्याप्त चाह, अभिलाषा या कामना की वृत्ति का आंकलन है...उसे समझने की साजिश है...मुझे लागता है सारी रचनाए, सरे सुखन, सारी अभिव्यक्तिय चीजो को समझने की कोशिश न होकर उनसे उनके परदे छीन लेने की साजिश है ग़ालिब ने इस शेर में अभिलाषाओ पर पड़े पर्दों को नोच बिखेरा है, उसे नंगेज़ किया है, उसे खालिस कर दिया है.
"हजारो ख्वाहिशे एसी..." मुलभुत रूप से कामनाओ की पड़ताल है. इस शेर के मायने भी गर्त में जमे हुवे है, गोया हर्फे सतह पर तिरते रहते है.
आखिर इसी क्या बात है कि इतने 'अरमान' निकल रहे है, फिर भी कम है, गोया एक-एक पे दम निकलता है.
छोटी-छोटी ख्वाहिशो के लिए भी एक ओसत आदमी को पूरी ताकत लगाकर दोड़ना होता है, बड़ी ख्वाहिशे बड़े सपनो में बदल जाती है, जो शायद ही पूरी होती हों, जबकि समय उसे ओर धुंधला करता जाता है और मात्र एक अदृश्य पश्चाताप की झीनी परत रह जाती है. क्योंकी फिर आदमी के पास समय कहा बचता है,समय तो आदमी को निरंतर काटता जा रहा है क्योकि.
मेने कई बार देखा है कि लोग मौत के लिए भी मिन्नतें करते है,क्योंकी वे लोग अपने जिवन के अंतिम समय में अभिलाषाओं से, जिवन के लिए संगृहीत सपनों से उक्ता जाते है. आखिर कब तक और क्या क्या अभिलाषाएं करे जबकि जिवन तो मुकाम पर पहुचने वाला है,लेकिन यह जल्दी क्यों नहीं पहुच रहा है? इसलिए जीवनांत के लिए एक और ख्वाहिश. और इसके लिए भी कितना दम लगते है लोग,प्रतीक्षा करते है, रोते है, पूजा करते है, दान करते है, भीख मांगते है उससे जिसने जिवन भीख में दिया.
एसी क्या बात है की आदमी सतत डिमांड करता है, एसी क्या चीज़ है आदमी के भीतर जिसके कारण आदमी खुद में एक डिमांडिंग काम्प्लेक्स निर्मित करता है, जो की आपने आवरणों मे बेहद सहज दिखता है, एक सहज वृत्ति सा.
"हजारो ख्वाहिशे आदमी करता है और उन्हें पूरा नहीं कर पाता" यह शेर का पहला मिसरा कहता है.दूसरा कहता है" कितने ही अरमान क्यू न निकल जाए, कम ही है." दूसरा मिसरा पहले से बिलकुल अलहदा है, यह मिसरा पहले मिसरे का पूरक नहीं लगता, इस मिसरे ने तो पहले वाले मिसरे को भग्न कर दिया है, उसकी मान्यताओ को तोड़ दिया है, ग़ालिब ने बिलकुल अलग बात कही है, जेसे वोह पहला मिसरा लिखते हो और दूजे में उसकी हंसी उड़ा रहे है, उसे हीन बता हरे है. यह मिसरा कहता है कि भले ही हजारों ख्वाहिशे हो, अनंत अभिलाषाए हो और चाहे उन हजारो में से प्रत्तेक को पूरा करने में दम निकलता हो! कोई बात नहीं, कितना ही क्यू न निकले दम, कम ही है. क्योकि एक एक विराट अभिलाषा हममे कही गहरी पेठी है, हमारी एक बहुत बड़ी ख्वाहिश है (शायद जिसका हमें कोई पाता न हो, कोई खबर न हो, कोई अंदाज़ा न हो) जो हममे कही जज़्ब है, जो हमारी आत्मा कि धरती में कही दफ्न है. वो है खुद को पा लेने कि ख्वाहिश, खुद को जन लेने कि तमन्ना.
भारतीय उर्दू साहित्य में ग़ालिब ही थे जिन्होंने पहली मर्तबा कामना की मोलिकता, उसके मूल स्वभाव की और इशारा किया. वेसे तो कामना की उदद्विग्नता को हर युग में पाप कर्म ही मन गया है, यहाँ तक कि कामना को शेतन का ओजार तक कहा गया है, चाहे ईसाइयत हो, यहूदी या मुस्लिम समुदाय, हर संप्रदाय में इसे पाप या पाप का कराल मन गया है. ग़ालिब मुस्लिम संप्रदाय से थे. एक बार उन्होंने खुदको आधा मुसलमान कहा था, मसलन एक अधुरा धर्मावलम्बी, वोह दुनियाभर के वाईजो से सीना ठोक के कहते है "वाईज़ शराब पिने दे मस्जिद में बेठ के, या वो जगह बता जहा पर खुदा न हो". ग़ालिब का आधा मुस्लमान होने में उनका वजूद है. शायद आधा मुस्लमान होना उतना मायने नहीं रखता जितना आधा खुद (self) का होने में रखता है, आधा मुस्लमान होना, यह उनका एक ओजार है जाहिदों के खिलाफ.यह उनके सुखन की एक खास विचारात्मक शेली है, उनके काव्य के मुलभुत विचारात्मक बिंदु.
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